सामाजिक औपचारिकताएं

अब एक हो तो कहूँ । यहाँ तो कभी कभी साँस लेने में सोचना पड़ता है की लोगों को कैसा लगेगा । कहीं आस पास बैठे लोगों को कष्ट ना हो जाए । अब मेट्रो में ही ले लो । हूडा सिटी सेंटर पे जब गाड़ी आयी तो मैं लपक के बैठ गया। जैसे आपने देखा ही होगा के कैसे ख़ाली ट्रेन का दरवाज़ा खुलने पे बाहर खड़े लोगों में ऐसे हड़कम्प मचती है जैसे मलयाली लोग २ दिन की छुट्टी के बाद शराब की दुकान के बाहर बेचैन से खड़े होते हैं और दुकान का दरवाज़ा खुलते ही स्टैम्पीड ही कर डालते हैं।

मैं कौनसा रोज़ जाता हुँ गुड गाँव । जैसे किसी अन्य स्टेशन पे भीड़ ही भीड़, मुझे लगेगा यहाँ भी सीट की मारा मारी होगी। बड़ी बेशर्मी से भागता हुआ सीट पे धरा गया मैं । बैठने के बाद देखा सीटें तो कई ख़ाली थीं ।  फिर ख़याल आया की अब तो  दिन डूबने को है। इसलिए धूप मेरी गर्दन पे पड़ेगी अगर में यहाँ बैठा तो। काले होने का इतना डर नहीं था जितना वहाँ बैठे गरमी कचोटने सी लगी १-२ मिनट में ही। सामने सीट खाली देखी थी तो मन  था कि उठ के वहाँ बैठ जाऊँ । अब यहाँ जिस धर्म संकट में मैं पड़ा , मुझे ख़ुद भी बताते हुए झेंप से होती है। मैं इस दुविधा में पड़ गया कि बग़ल वाला क्या सोचेगा ! हे भगवान , मैंने तो शायद उसकी अब तक शक्ल भी नहीं देखी थी। फिर भी ऐसा संकोच ! बड़ी हिम्मत करके सामान उठाया और सामने जाकर बैठा और बैठते ही उस आदमी का चेहरा चोर नज़रों से देखने कि कोशिश की कहीं वो भून्नाया हुआ तो नहीं । देखा और पाया , वह तो सो रहा था ।

अब लगी भूख । सुबह साढ़े आठ बजे नाश्ता करके घर से निकला था।  जहाँ इंटर्व्यू देने गया था, उन हरामखोरों ने लंच तक ना ऑफ़र किया। ख़ैर करते भी तो मैं कौनसा खाया ही बैठा था। अपने दफ़्तर जाने के लिए भी तो देर हुई जा रही थी। लंच के डिब्बे की सोची तो ट्रेन में खाने योग्य कटे हुए ख़रबूज़े ही लगे । मम्मी ने संग में सीख भी रखी थी । ना हाथ गंदे होने का झंझट ना ही कोई एम्बैरस्मेंट । कान में राग पहाड़ी ताकि आस पास की निगाहों की तरफ़ ध्यान भी न जाए । आइ मीन, कुछ लोग ख़रबूज़ा खाना या ट्रेन में कुछ भी खाना सही नहीं समझते। क़ायदे से तो नहीं खाना चाहिए, पर भूख भी तो थी। और उससे अधिक महत्वपूर्ण बात यह की घर से तय्यार लंच यूँ ज़ाया होना बहुत बुरी बात होती।   ख़रबूज़े ख़त्म हुए । ढाई तो बज ही चुके थे । अपने दफ़्तर पहुँच कर समय  मिल पाए या नहीं । दही तो तब तक शायद ख़राब हो हो जाए । पूरे दिन से बेचारा खाने का डिब्बा मेरे साथ लगा लगा फिर रहा था । इतनी गरमी कि आदमी सड़ रहे थे, तो दही चीज़ ही  क्या थी ।  दही का डिब्बा निकाल के देखा तो माथा ठनक गया । हर बार की तरह आज भी एक तरफ़ से खुला हुआ और पन्नी में दही गिरी हुई थी । दिमाग़ में बस एक ही ख़याल आया – ‘आइ काँट डील विध दिस मेस्स नाउ’ । डिब्बा जैसे निकाला था वैसे ही वापस रख दिया । ना चम्मच थी, ऊपर से दही खिन – बिन और फिर दिन भर की गरमी से थोड़ी खट्टी भी हो गई थी –  उस बबाल से इस समय उलझना मतलब संकोच और औपचारिकताओं के सारे पहाड़ लाँग जाना ।

५ मिनट हो गए थे। फिर ख़याल आया – टू हैल विथ दीज़ स्ट्रेनजर्स, दही पी तो सकता ही हूँ। उसमें क्या चम्मच। मूछें बन भी गईं तो क्या फ़र्क़ पड़ता है – इन अजंबियों ने बड़ा याद रखना है मुझे । और रूमाल तो था ही मेरे पास, अगर कोई आपात्कालीन स्थिति होती भी तो।

मैंने कान में राग और तेज़ कर दिए ताकि लोगों की काल्पनिक नज़रें इन आवाज़ों में दब जाएँ । डिब्बा फिर बाहर निकाला , पन्नी हटाई, धीरे से ढक्कन खोला,   आँख बंद करके ४-५ बड़े घूँट में पूरी दही पी गया। रूमाल से साफ़ पोंछ करने के बाद फिर अपनी किताब ‘सीट नम्बर ६’ में रम गया मैं ।

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Uncle Uncle Uncle

Uncle Uncle Uncle

Of late when I meet some married acquaintance of mine, I am getting a new tag – ‘Uncle’. When ever I visit his/her family, the kids address me as uncle. Or that friend will ask the kid to ‘say hello to uncle’. I remember when Papa’s friend Sanjay ‘uncle’ used to visit us, we would call him uncle only, and he used to be of same age as I am today, and he too was unmarried. In fact, there were lots of Papa’s friends who were uncles for us. So for my married friends, it’s perfectly fine for them to find an uncle in me for their kids. But I fail to find a fixed point in time line when I made this transition from ‘Bhaiyya’ to ‘Uncle’. Or was it rather a gradual transition? Whatever it may be, it hurts to feel I have aged. A ‘Chaachu’ might have felt pleasant and less age defining! But then it would have become a formal relationship in Indian set up, whereas ‘Uncle’ is a freeway relationship, you get in and get out as and when convenient!

But the uncle episode gives me one more reason to run away to US of A, where everyone other than father is uncle/sir. And when you are not addressing someone by uncle, you address him by his name, even if he is your step dad of twice your age, “Hey Bob, didn’t Mom come with you today?” 

BhaiSaahib

It was Saturday morning, I was goin back to home after a tennis game, when I saw Sandeep Laxmi Sri Pada, my colleague, getting down from a rickshaw. He addressed rickshaw puller as “bhai saab”. That was a first to me. I never heard any rickshaw puller being called ‘bhai saab’. I don’t know whether it was out of respect, or Sandeep would use this for any stranger. Nor do I want to generalize that all people of Andhra of south India are polite with others. All I am saying is that it was a pleasant sight. That rickshaw puller must have felt happy. In fact we should call every one – plumber, mechanic, waiter, maid – as bhai saab, and do away the north-indian, “Bhaiyya”, that way, Marathi’s in general and Raj Thakeray in particular would also not be offended  as they keep complaining that bhaiyya’s from UP and Bihar intrude Maharashtra.

The regular embarassment

There are few situations of awkwardness which I face every now and then. Problem is one can’t get rid of them, you run into them almost everyday.

Firstly, if someone sings just casually and makes facial expression and looks or comes towards you or looks at you as if singing to you, although he might be in the mind emphasizing the meaning/feeling of song and least aware of me or the embarrassment within storming my mind. What the hell he/she is doing? Why can’t he sing alone? I never do that torture to anyone. I sing only in elevator when there is no one else. I wonder if in those times, I should sing with them, or sing along them – both these actions will make me feel even more embarrassed. Or should I ignore them, like they don’t exist. That might make them feel I am not attending them, or more busy in my work! What to do man.

Secondly, people cracking awfully pathetic jokes. How can someone do this to me? It’s tough to laugh. I just smile to give them some respect lest they should feel ignored and consider me rude. But it becomes a torture, when I am the butt of joke. I don’t mind laughing at myself, but the joke has to be funny by my humor. So now when I smile, people feel I am shying. Wht mother crap is that. I guess in future, I should smile or laugh only when I feel like doing the same, without giving shit to any social obligations. Like Sachin does. Yet everyone loves him.

Thirdly (and certainly not the last), grown ups asking me how much money I make. Do they not have least social manners? It’s so embarrassing.

girl power

I wonder what that girl with big balls with wanted ? Wearing a tshirt reading ‘I need Kisses’, what do they expect men to do. Similarly, tht girl with a t-shirt reading cool, but actually the two ‘o’ were mising there. She was supposedly to using her balls to make up for that, atleast the positon of ‘c’ and ‘l’ suggested tht.